
दुनिया का सबसे शक्तिशाली जीव न हाथी है न बैल न घोड़ा। वह है तुच्छ समझा जानेवाला घोंघा। घोंघा स्वयं 100 ग्राम से भी कम भारी होता है, पर वह अपने वजन से 400 गुना अधिक भारी वस्तुओं को खींच सकता है। पर उसकी रफ्तार बहुत ही धीमी होती है, लगभग 5 मीटर प्रति घंटा।
मंगलवार, 2 जून 2009
दुनिया का सबसे शक्तिशाली जीव
प्रस्तुतकर्ता बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण पर 2:42 am 0 टिप्पणियाँ
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सोमवार, 1 जून 2009
बाल कहानी : जादुई रंग बक्सा
वसुंधरा का पांचवां जनम दिन था। उसके नानाजी उसके लिए एक तोहफा लाए थे। वह चमकीले कागज में लिपटा था और लाल रिबन से बंधा था।
वसुंधरा ने तोहफा नानाजी से लिया और बड़े कुतूहल से उसे खोलने लगी। वह एक सुंदर रंग बक्सा था।
नानाजी ने कहा, "बेटा यह एक खास तरह का रंग बक्सा है, जैसा कि तुम्हें जल्द मालूम हो जाएगा।"
वसुंधरा बहुत ही खुश हुई। उसे चित्र बनाना और उनमें रंग भरना बेहद पसंद था। "ओह नानाजी, आप कितने अच्छे हैं!" कहकर वह अपने नानाजी से लिपट गई। नानाजी मुसकुरा उठे।
वसुंधरा ने कागज पर पेंसिल से तितली का चित्र बनाया और रंग बक्सा खोलकर तितली के पंखों पर तरह-तरह के रंग भरने लगी। जब चित्र पूरा हो गया तो वसुंधरा थोड़ा पीछे हटकर चित्र को निहारने लगी। वह अभी चित्र को परख ही रही थी कि तितली ने अपने सुंदर पंख खोले और कागज से उड़ गई। थोड़ा इधर-उधर भटककर वह बगीचे के एक फूल पर जा बैठी। यह देखकर वसुंधरा पहले तो बहुत चौंकी। पर तभी उसे नानाजी की बात याद आई कि रंग बक्सा खास प्रकार का है। वह शायद जादुई रंग बक्सा था। वसुंधरा सब समझ गई।
अब वसुंधरा ने एक सुंदर रंग-बिरंगी चिड़िया का चित्र बनाया। चित्र पूरा होते ही चिड़िया चीं-चीं करके बोल उठी। अपने नन्हें पंखों को थोड़ा फड़फड़ाकर वह पहले वसुंधरा के सिर पर बैठी फिर खिड़की से बाहर उड़ गई। इस बार वसुंधरा जरा भी नहीं चौंकी। उसे पता था कि चिड़िया ठीक वैसा ही करेगी।
इसके बाद वसुंधरा ने गिलहरी, खरगोश, मेंढ़क आदि के चित्र बनाए। वे सब कागज से जिंदा होकर बगीचे में आ गए और वहां कूदने, फुदकने और बोलने लगे। उन्हें देखकर वसुंधरा बहुत ही प्रसन्न हुई।
प्रस्तुतकर्ता बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण पर 7:51 pm 0 टिप्पणियाँ
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बैंक का स्थानांतरण
अमेरिका की एक रियासत का नाम डकोटा है। वहां पिछली सदी के शुरू के वर्षों में एक बैंक था। उसे वहां से उखाड़ कर 15 मील दूर एक दूसरी जगह पर रख दिया गया. बैंक की इमारत उठाकर पहले बड़ी-बड़ी गाड़ियों पर रखी गई. फिर वे गाड़ियां बेलनों पर चढ़ाई गईं। गाड़ियों में आगे और दाहिने बाएं बहुत से घोड़े जोत दिए गए। बस उन्होंने खींच कर बैंक को इच्छित स्थान पर पहुंचा दिया। बैंक की इमारत खाली नहीं थी। उसकी चीज-वस्तु सब उसी के भीतर थी। यही नहीं, बल्कि उसके कुछ क्रमचारी भी यह तमाशा देखने के लिए उसके भीतर थे।
प्रस्तुतकर्ता बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण पर 7:02 am 0 टिप्पणियाँ
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हाथियों के लिए पेंशन

वन विभाग के साथ काम कर रहे हाथियों को अब पेंशन मिलेगा। जब वे सेवानिवृत्त हो जाएंगे, उन्हें मृत्यु पर्यंत गन्ना, केला, आटा और चारा उपलब्ध कराया जाएगा।
उप अरण्यपाल श्री अतिबल सिंह के अनुसार इससे पहले हाथियों के सेवानिवृत्त होने का कोई उम्र नहीं निश्चित था। वे लगभग 10 साल की उम्र से काम करने लगते थे। पर अब यदि हाथियों की देखरेख से जुड़े किसी भी अधिकारी को लगे कि हाथी कमजोर और बूढ़ा हो गया है और उससे काम करते नहीं बनता, तो वह उसे रिटायर कर सकता है।
नए नियमों में गर्भिणी हथिनियों के लिए दो वर्ष के मेटेर्निटी लीव की व्यवस्था भी की गई है।
प्रस्तुतकर्ता बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण पर 3:23 am 0 टिप्पणियाँ
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शनिवार, 30 मई 2009
बीमारों के लिए घड़ी
म्युनिच के एक अध्यापक ने एक बार बीमारों के लिए एक घड़ी बनाई जिसके पीछे बिजली का एक बल्ब लगा रहता था। यह बल्ब तार के द्वारा बीमार की चारपाई से जुड़ा होता था। चारपाई वाले तार के छोर में एक स्विच होता था। जब बीमार वक्त देखना चाहता था, तब वह उस स्विच को दबाता था। दबाते ही बल्ब जल उठता था और घड़ी की छाया ऊपर छत पर पड़ती थी। छाया में घंटे और मिनट के कांटे और अंक के निशान बढ़े हुए आकार में दिखाई पड़ते थे। उसे देखकर रोगी बिना गर्दन टेढ़ी किए अपनी चारपाई पर लेटे-लेटे ही वक्त मालूम कर सकता था।
प्रस्तुतकर्ता बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण पर 10:40 pm 0 टिप्पणियाँ
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